लद्दाख की चिंताओं को सुनें
पृष्ठभूमि:
- लद्दाख में सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच 'सबसे खूनी दिन' (सबसे अधिक मौत वाले दिन) को लेकर अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं।
- प्रदर्शनकारियों की मौत के कारण वहां का माहौल
तनावपूर्ण हो गया है।
- जब धारा 370 हटाई गई थी, तब लद्दाख को एक
अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने का स्वागत किया गया था। बीजेपी नेता जमयांग
त्सेरिंग नामग्याल और इंजीनियर सोनम वांगचुक ने भी इस फैसले की
तारीफ की थी।
- लेकिन अब नामग्याल ने खुद कहा है कि
"लद्दाख नाजुक मोड़ पर खड़ा है।" वहीं, सोनम वांगचुक को पुलिस ने 'भड़काऊ' भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर
लिया है।
मुख्य मुद्दे और सरकार की
प्रतिक्रिया:
- चार निहत्थे प्रदर्शनकारियों की मौत गोली लगने
से हुई। संपादकीय में कहा गया है कि पुलिस की सख्त कार्रवाई किसी समस्या का
समाधान नहीं है।
- लद्दाख के लोगों की दो मुख्य माँगें हैं:
- राज्य का दर्जा: लगभग 3 लाख की आबादी वाले लद्दाख को
राज्य का दर्जा मिलना बहुत मुश्किल है, खासकर जब जम्मू
और कश्मीर को भी यह दर्जा नहीं मिला है।
- संविधान की छठी अनुसूची में
शामिल करना: यह भी एक मुश्किल माँग है, क्योंकि अगर ऐसा किया गया, तो
सरकार को मणिपुर जैसे अन्य राज्यों को भी इसमें शामिल करने की माँग का सामना
करना पड़ेगा।
- केंद्र सरकार को इन माँगों को पूरा करना भले ही
मुश्किल लगे, लेकिन उसे प्रदर्शनकारियों से बात करनी चाहिए। सरकार के पास बातचीत
से संकट सुलझाने का पुराना और सफल तरीका है।
आगे की राह:
- लद्दाख के लोगों की कुछ और चिंताएँ भी हैं जो
बहुत गंभीर हैं:
- 2019 के बाद से लद्दाख में एक भी
राजपत्रित पद (gazetted posts) नहीं भरा
गया है, जिससे युवाओं में निराशा है।
- उन्हें डर है कि वे जलवायु
परिवर्तन के कारण जलवायु शरणार्थी (climate refugees) बन सकते हैं। यह एक बहुत ही
वास्तविक खतरा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
- लद्दाख की स्थिति को शांत करने के लिए, केंद्र सरकार को उनकी बातों को
सुनना और उन चिंताओं को गंभीरता से लेना सबसे ज़रूरी है।
शहरों को होर्डिंग से मुक्त करें
यह संपादकीय शहरों में लगे अवैध
होर्डिंग की समस्या और उनके खतरों के बारे में है।
- समस्या: भारत के शहरों में, खासकर त्योहारों के समय,
हर जगह होर्डिंग लग जाते हैं। इनमें से कई होर्डिंग नियमों का
उल्लंघन करते हैं, जैसे उनके आकार, दूरी और ऊंचाई को लेकर बनाए गए नियम।
- खतरे: ये अवैध होर्डिंग केवल शहर की सुंदरता को ही
खराब नहीं करते, बल्कि ये जानलेवा भी हो सकते हैं। मुंबई के घाटकोपर में 2024 में एक बड़ा होर्डिंग गिर गया था, जिससे 17
लोगों की मौत हो गई थी। बाद में पता चला कि इसे बिना सही
मंजूरी और सुरक्षा प्रमाणपत्र के लगाया गया था।
- कारण:
- लागू न होने वाले कानून: 'प्रॉपर्टी डिफेसमेंट एक्ट'
जैसे कानून कमजोर हैं।
- राजनीतिक दबाव और लापरवाही: राजनीतिक हस्तक्षेप और
सरकारी कर्मचारियों की ढिलाई के कारण इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
- समाधान:
- अधिकारियों को नियमित रूप से
अवैध होर्डिंग हटाने के अभियान चलाने चाहिए।
- नियम तोड़ने वाले
विज्ञापनदाताओं पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए।
- टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया
जाना चाहिए, जैसे वैध होर्डिंग पर QR कोड लगाना और उल्लंघन का पता लगाने के लिए ड्रोन का उपयोग करना।
- संपादकीय में कहा गया है कि
यह केवल एक सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक सुरक्षा का
खतरा है जो ट्रैफिक को भी बाधित करता है। एक विकसित देश की पहचान उसके
साफ-सुथरे शहरों से शुरू होती है।
बलूचों की जंग आजादी के लिए है आतंक के लिए नहीं
यह संपादकीय पाकिस्तान के
बलूचिस्तान प्रांत में चल रहे संघर्ष के बारे में है।
- मुद्दा: पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
(UNSC) में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA)
को एक आतंकवादी संगठन घोषित करने का प्रस्ताव रखा।
- परिणाम: अमेरिका, फ्रांस और यूके ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया,
क्योंकि पाकिस्तान BLA का अल कायदा या
आईएस जैसे संगठनों से संबंध होने का कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाया।
- संघर्ष का कारण:
- उपेक्षा और दमन: बलूचिस्तान पाकिस्तान का 44% क्षेत्रफल कवर करता है और
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, लेकिन इसकी जीडीपी
में योगदान सिर्फ 7% है। पाकिस्तान की सरकार ने 77
सालों से इस प्रांत की उपेक्षा की है।
- आर्थिक असमानता: 5 से 16 साल
की उम्र के 70% बच्चे स्कूल नहीं जाते और 65% युवा बेरोजगार हैं।
- चीन की भागीदारी: बलूच लोगों की राय के बिना
चीन ग्वादर बंदरगाह पर काम कर रहा है, जिसके कारण बलूच आंदोलन चीन का भी विरोध करता है।
- निष्कर्ष: संपादकीय में तर्क दिया गया है कि बलूच लोगों
का संघर्ष आतंक के लिए नहीं,
बल्कि अपने अधिकारों और आजादी के लिए है। पाकिस्तान द्वारा इसे
आतंकवाद का रूप देने की कोशिश का संयुक्त राष्ट्र में मज़ाक बना।
एक देश के रूप में हमें सच्ची असहमतियों की जरूरत है
यह संपादकीय भारत में असहमति और
आलोचना पर आधारित सार्वजनिक बहस के बारे में है।
- मुख्य विचार: एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आलोचना और असहमति
बहुत जरूरी है। भारत जैसे बड़े और विविध देश में हर मुद्दे पर सरकार से सहमत
होना संभव नहीं है।
- गलत तुलना: हाल ही में, कुछ लोग भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शनों की तुलना
नेपाल में हुई 'जेन-जी क्रांति' से
कर रहे हैं। लेखक का मानना है कि यह तुलना गलत है क्योंकि भारत एक मजबूत
लोकतांत्रिक देश है, जबकि नेपाल का इतिहास अलग रहा है।
- ध्रुवीकरण (Polarization): भारत में अब सार्वजनिक बहस बहुत
ध्रुवीकृत हो गई है। अगर आप सरकार का समर्थन करते हैं तो आप राष्ट्रवादी हैं,
और अगर आप आलोचना करते हैं तो आप पर अराजकता फैलाने या देश को
तोड़ने का आरोप लगाया जाता है।
- संवैधानिक अधिकार: भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार देता है। किसानों, छात्रों और मजदूरों के विरोध को
देशद्रोह कहना गलत है, क्योंकि यह उनकी जायज़ शिकायतों
की अनदेखी करता है।
- सच्चाई: लेखक के अनुसार, देश में विकास के दावे भले ही
किए जा रहे हों, लेकिन बेरोजगारी, बढ़ती असमानता और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं भी मौजूद हैं। इन
समस्याओं पर होने वाले विरोध को 'अराजकता' कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन यह लोकतंत्र के
लिए खतरनाक है।
- निष्कर्ष: एक स्वस्थ राष्ट्र वह है जो अपने नागरिकों को
खुलकर बोलने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने की अनुमति देता है। भारत को मौन
नागरिकों की नहीं, बल्कि रचनात्मक और समावेशी असहमति की जरूरत है।
हमारे यहां चुनाव स्वतंत्र तो हैं किंतु क्या वे निष्पक्ष भी हैं?
यह संपादकीय भारतीय चुनावों की
स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
- स्वतंत्रता: लेखक के अनुसार, भारतीय चुनाव बहुत हद तक
स्वतंत्र हैं। आजादी के बाद से 18 आम चुनावों तक भारत
ने एक मजबूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया विकसित की है।
- शुरुआती दिनों में बूथ
कैप्चरिंग जैसी घटनाएं होती थीं, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के आने और मतदाताओं के जागरूक होने से ऐसी समस्याएं कम हो गई हैं।
- आज हर नागरिक का वोट समान है, चाहे वह एक मजदूर हो या कोई
अरबपति। यह एक बड़ी उपलब्धि है।
- निष्पक्षता पर सवाल: लेखक का तर्क है कि चुनाव स्वतंत्र तो हैं, लेकिन निष्पक्ष (fair)
नहीं हैं।
- धन और सत्ता का दुरुपयोग: सत्ताधारी दल चुनाव में
अपने विरोधियों पर हावी होने के लिए पैसे और सत्ता का दुरुपयोग करते हैं।
- सरकारी एजेंसियों का उपयोग: राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों
को निशाना बनाने के लिए सरकारी एजेंसियों, जैसे आयकर विभाग का इस्तेमाल
किया जाता है।
- ‘रेवड़ी पॉलिटिक्स’: सत्ताधारी दल चुनाव जीतने
के लिए करदाताओं के पैसे से कल्याणकारी योजनाएं चलाकर कुछ खास समूहों को
लुभाते हैं।
- नैरेटिव पर नियंत्रण: सरकार विज्ञापनों पर भारी
पैसा खर्च करके अपने पक्ष में माहौल बनाती है।
- चुनाव आयोग पर सवाल: लेखक ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए
हैं।
- जब कांग्रेस के खाते फ्रीज
किए गए, तब आयोग ने
कोई कार्रवाई नहीं की।
- सांप्रदायिक बयानबाजी पर कोई
रोक नहीं लगाई गई।
- संपादकीय में कहा गया है कि
निष्पक्ष चुनाव के लिए एक ऐसे आयोग की जरूरत है जो पूरी तरह से निष्पक्ष
होकर काम करे।
हठधर्मी का नतीजा है लेह की हिंसा
यह संपादकीय लेह में हुई हिंसा की
घटनाओं और उसके पीछे के कारणों का विश्लेषण करता है।
- हिंसा की घटना: लेह में हाल ही में प्रदर्शन हिंसक हो गया, जिसमें भीड़ ने सरकारी
कार्यालयों और वाहनों को निशाना बनाया। लेखक का कहना है कि यह हिंसा बिना
तैयारी के नहीं हो सकती।
- सोनम वांगचुक की भूमिका: लेखक सोनम वांगचुक की भूमिका
पर सवाल उठाते हैं, जो 15 दिन से भूख हड़ताल पर थे। वांगचुक ने
हिंसा की निंदा की, लेकिन यह भी कहा कि युवाओं में
निराशा है क्योंकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन से कोई नतीजा नहीं निकल रहा।
- सरकार का पक्ष:
- सरकार के अनुसार, मांगों पर पहले से ही बातचीत
चल रही थी।
- एक उच्च-स्तरीय समिति की
बैठक भी तय थी।
- कई माँगें पूरी भी हो चुकी
थीं, जैसे
अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण में वृद्धि, पंचायतों
में महिलाओं के लिए आरक्षण और कुछ आधिकारिक भाषाओं की घोषणा।
- सरकार का मानना है कि
प्रदर्शनकारियों ने हठधर्मिता (adamance) दिखाई और बातचीत के बजाय हिंसा
का रास्ता चुना।
- विवाद और आरोप:
- लेखक का आरोप है कि सोनम
वांगचुक और उनके समर्थकों ने जानबूझकर 'अरब स्प्रिंग' और 'नेपाल के जेन-जी' जैसे हिंसक आंदोलनों की बात
की, जिससे युवाओं में हिंसा भड़काने का मनोविज्ञान
पैदा हुआ।
- वांगचुक के एनजीओ की विदेशी
फंडिंग पर भी सवाल उठाए गए हैं।
- निष्कर्ष:
- यह संपादकीय मानता है कि
लद्दाख की स्वायत्तता का संघर्ष पुराना है, लेकिन चीन और पाकिस्तान जैसे
पड़ोसियों को देखते हुए इस तरह की हिंसा देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।
- लेखक का कहना है कि
शांतिपूर्ण लद्दाखी लोग ऐसी अराजकता का समर्थन नहीं कर सकते। यह कुछ लोगों की
हठधर्मिता का नतीजा है।
'इस्लामिक नाटो’ का नया समीकरण
यह संपादकीय सऊदी अरब और पाकिस्तान
के बीच हुए नए सुरक्षा समझौते और भारत पर उसके संभावित प्रभावों के बारे में है।
- समझौता: 17 सितंबर 2025 को सऊदी अरब और
पाकिस्तान के बीच 'स्ट्रेटेजिक म्युचुअल डिफेंस
एग्रीमेंट' नामक एक रणनीतिक रक्षा समझौता हुआ। इसे कुछ
लोग 'इस्लामिक नाटो' कह
रहे हैं, क्योंकि इसमें एक देश पर हमले को दूसरे देश पर
हमला माना जाएगा।
- समझौते के उद्देश्य:
- महाशक्ति का उदय: इस समझौते को पाकिस्तान की
परमाणु शक्ति और सऊदी अरब की आर्थिक ताकत के मिलने के रूप में देखा जा रहा
है।
- ईरान का मुकाबला: इस समझौते का एक बड़ा कारण
ईरान के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम को संतुलित करना भी है।
- अमेरिका की भूमिका: अमेरिका की बदलती सुरक्षा
नीतियों के कारण भी ये देश आपस में गठबंधन कर रहे हैं।
- भारत के लिए चुनौतियाँ:
- यह समझौता भारत के लिए एक
बड़ी रणनीतिक चुनौती (strategic challenge) है।
- सऊदी अरब से आर्थिक और
राजनीतिक समर्थन मिलने पर पाकिस्तान, भारत के खिलाफ कश्मीर में आतंकवाद को फिर से
बढ़ावा दे सकता है।
- यह खाड़ी और दक्षिण एशिया
में भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है।
- भारत की स्थिति:
- भारत और सऊदी अरब के आर्थिक
संबंध बहुत मजबूत हैं। सऊदी अरब भारत का 5वां सबसे बड़ा व्यापारिक
साझेदार है।
- सऊदी अरब ने अतीत में
भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों के दौरान संयमित रुख अपनाया है और भारत
के खिलाफ कोई बड़ा बयान नहीं दिया।
- निष्कर्ष: यह समझौता भारत के लिए चिंता का विषय है, लेकिन इसे शांत और सतर्कता के
साथ संभालने की जरूरत है। भारत को अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना
होगा।
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