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SC ने आरक्षण पर 50% की सीमा तय की है परन्तु राज्य इस सीमा को तोड़कर इससे ज्यादा आरक्षण क्यों दे रहे है? क्या यह अवमानना है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय कुछ करते क्यों नहीं?

 प्रश्न :- भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण पर 50% की सीमा तय की है परन्तु फिर भी कुछ राज्य इस सीमा को तोड़कर इससे ज्यादा आरक्षण दे रहे है अतः यह न्यायालय की अवमानना का मुकदमा है परन्तु राज्यों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती है ?

उत्तर :- भारत में आरक्षण पर 50% की सीमा का निर्धारण 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (मंडल आयोग मामला) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि आरक्षण का प्रतिशत 50% से अधिक नहीं होना चाहिए, ताकि समानता का अधिकार बना रहे। लेकिन इसके बावजूद कुछ राज्य इस सीमा को पार कर 50% से अधिक आरक्षण दे रहे हैं। इसके पीछे कई कारण और विशेष परिस्थितियाँ होती हैं, जो इसे न्यायालय की अवमानना के बजाय राज्य की नीति का हिस्सा बनाती हैं। यहाँ इस विषय को समझने के कुछ महत्वपूर्ण कारण दिए गए हैं:



1. विशेष परिस्थितियों का हवाला

  • कई राज्य, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि, अपने समाज में पिछड़े वर्गों और अन्य कमजोर समुदायों की अधिक संख्या का हवाला देकर यह तर्क देते हैं कि उनके यहाँ आरक्षण की आवश्यकता अधिक है। इसलिए, वे सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति का विश्लेषण कर आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाते हैं।
  • तमिलनाडु में, उदाहरण के लिए, राज्य में 69% आरक्षण है, जो विशेष अधिनियम के तहत 9वीं अनुसूची में डालकर लागू किया गया है ताकि इस पर न्यायिक समीक्षा नहीं हो सके।

2. संविधान की 9वीं अनुसूची का उपयोग

  • कुछ राज्यों ने आरक्षण कानूनों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल कर दिया है। संविधान की 9वीं अनुसूची में डाले गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा से छूट दी गई है, यानी इन कानूनों पर सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय समीक्षा नहीं कर सकता। यह प्रक्रिया 1951 में पहले संवैधानिक संशोधन के तहत बनाई गई थी ताकि कुछ कानूनों को न्यायिक दखल से सुरक्षित रखा जा सके।

3. विशेष राज्य की स्थिति और जनसंख्या आंकड़े

  • कई राज्यों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की आबादी अत्यधिक है। वे तर्क देते हैं कि 50% की सीमा उनके राज्य की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता के अनुरूप नहीं है। इस कारण वे विशेष परिस्थिति के आधार पर उच्चतम न्यायालय से अनुमति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं या राज्य विधानमंडल में विशेष कानून पास करते हैं।

4. संविधान संशोधन द्वारा अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान

  • केंद्र सरकार ने 103 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम - 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए अतिरिक्त 10% आरक्षण का प्रावधान किया। इस संशोधन के बाद आरक्षण की सीमा 50% से बढ़कर 60% तक हो गई। इस कदम से राज्यों को भी अतिरिक्त आरक्षण देने के प्रावधान का एक मार्गदर्शन मिल गया है।

5. लंबित न्यायिक चुनौतियाँ और समीक्षा प्रक्रियाएँ

  • कई राज्यों में 50% से अधिक आरक्षण के कानूनों को चुनौती दी गई है और वे मामले अभी भी न्यायालय में लंबित हैं। जब तक न्यायालय अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक उन कानूनों को अवैध नहीं माना जाता है।

6. राजनीतिक कारण और वोट बैंक

  • आरक्षण एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है, और कई राज्यों में राजनीतिक दल आरक्षण का समर्थन करने के लिए कानून बनाते हैं ताकि उनके राज्य के पिछड़े और कमजोर वर्गों का समर्थन प्राप्त किया जा सके। इससे समाज में एक प्रकार का समर्थन हासिल किया जाता है और सरकारें इसे सामाजिक न्याय के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

7. संवैधानिक अधिकार और राज्य की स्वायत्तता

  • भारतीय संविधान राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है। कुछ राज्य इसी आधार पर अपने यहाँ आरक्षण को बढ़ाते हैं और इसे अपने संवैधानिक अधिकार के रूप में देखते हैं।
  • जैसे 105 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2021 यह अधिनियम राज्यों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने व निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है जिसमें प्रविष्टियां संघ सूची से भिन्न हो सकती हैं

8. न्यायालय की व्याख्या और विशेष अनुमति

  • सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50% तक रखने की सिफारिश दी है, लेकिन वह यह भी मानता है कि विशेष परिस्थितियों में इसे बढ़ाने की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में कुछ राज्यों को विशेष अनुमति भी प्राप्त होती है या न्यायालय उन मामलों में सहानुभूति दिखाता है, जिससे न्यायालय की अवमानना का मामला नहीं बनता।

निष्कर्ष

आरक्षण सीमा को पार करने का मुद्दा काफी संवेदनशील और जटिल है। इसके कानूनी और सामाजिक दोनों पक्ष होते हैं। जब तक सर्वोच्च न्यायालय इन मामलों में एक निर्णायक निर्णय नहीं देता, तब तक राज्य सरकारें अपने सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर आरक्षण नीति बनाती हैं। न्यायालय इन मामलों में अवमानना का मामला तभी बनाता है जब स्पष्ट रूप से संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो और न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन न किया जाए।

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