शिलांग का अंतिम पत्र
1920 के दशक का मेघालय का शिलॉंग, जहाँ हर कोने में हरियाली और बादलों का साम्राज्य था। यहाँ हर सुबह ठंडी हवाएँ पेड़ों से बात करतीं, और शाम को बारिश की हल्की बूंदे पूरे शहर को एक नयी ताजगी से भर देती थीं। ठंडी हवाओं और शांत पहाड़ियों के बीच बसा यह शिलॉंग शहर, अपने अद्वितीय सौंदर्य और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता था। यहीं पर मीरा नाम की एक खूबसूरत लड़की रहती थी, जिसकी सुंदरता और आकर्षण ने पूरे शहर को मोह लिया था। मीरा, अपने शारीरिक सौंदर्य के लिए शहरभर में प्रसिद्ध थी लोग कहते थे की “सुन्दरता हो तो व्यापारी की बेटी के जैसी” और इस बात का उसे गर्व भी था। लोग उसकी मुस्कान, उसकी आँखों की चमक और उसकी कोमलता की तारीफें किया करते थे। वह अपने श्रृंगार और बाहरी आकर्षण को सबसे अधिक महत्व देती थी।
मीरा के पिता, एक सफल व्यापारी थे जिनका हैंडलूम का व्यापार था, उन्होंने एक ईमानदार और मेहनती सलाहकार को नौकरी पर रखा, राम जो सिक्किम से था, अक्सर उनके व्यापार में मदद करता था। राम एक सीधा-सादा, शांत स्वभाव का लड़का था। वह दिखने में साधारण परन्तु बौद्धिकता से परिपूर्ण था, पर उसका दिल साफ था और उसका जीवन सादगी और काम के प्रति समर्पण से भरा था। राम अक्सर काम से समय निकालकर पहाड़ों पर जाकर एकांत में विभिन्न दार्शनिकों के दर्शन को पढ़कर सोच में डूब जाता था मीरा अक्सर राम की इस साधारण जीवन और ज्ञान से मंत्रमुग्ध थी परन्तु वह स्वयं इन अध्ययन से कोसों दूर रहा करती थी, प्रतिदिन राम को पहाड़ों पर कॉफ़ी बनाकर ले जाती थी राम उसको दर्शन समझाने की भरसक असफल कोशिश करता था परन्तु उसका दिल तो सिर्फ उसकी बातों को सुनने और और उसे देखने में व्यस्त रहता था। मीरा और राम के बीच धीरे-धीरे एक संबंध बनने लगा। मीरा, अपने आकर्षण से राम को प्रभावित करने की कोशिश करती, और राम भी उसकी सुंदरता से मोहित हो गया।
दोनों ने एक-दूसरे के साथ समय बिताना शुरू किया, साथ में शहर की सड़कों पर घूमते, पहाड़ियों की सुंदरता का आनंद लेते। मीरा राम के प्रति गहरे प्रेम में पड़ गई। उसे लगता था कि उसकी सुंदरता ने राम का दिल जीत लिया है, और राम भी अपने दिल में मीरा के लिए जगह बना रहा था।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, राम ने महसूस किया कि उनका संबंध केवल शारीरिक आकर्षण पर आधारित था। उसने सोचना शुरू किया दिनों, महिनों, साल बीत गए मीरा को यह समझाते हुए कि प्यार में केवल बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि बुद्धि, समझ और गहराई का भी स्थान होना चाहिए। और अगर इस तरह रिश्ते में रहेंगे तो ज्यादा दिन तक कैसे जी पाएंगे राम ने धीरे-धीरे मीरा के साथ अपने रिश्ते को लेकर संदेह करना शुरू कर दिया। उसने मीरा से इस बारे में बात की, पर मीरा को यह सब समझ नहीं आया। वह गुस्सा होती, झगड़ती, और राम से यह पूछती कि क्या वह उसकी सुंदरता से संतुष्ट नहीं है? राम का जवाब था, "सुंदरता क्षणिक है, मीरा। असली प्रेम आत्मा और बुद्धि में है।" इसलिए हम दोनों को एक साधारण मित्रता भाव से किंचित भी आगे नहीं बढ़ना चाहिए और वैसे भी आपके पिता मुझ जैसे कर्मचारी के साथ आपका विवाह क्यों करेंगे ?
मीरा का दिल टूटने लगा, पर वह राम को छोड़ नहीं पाई। वह उसके साथ रहती, लड़ती, पर प्रेम करती रही। राम भी उसे केवल बौद्धिक ज्ञान के आधार पर समझाता रहा। समय बीतता गया, और उनका संबंध और जटिल होता गया। शादी की बात भी आई, लेकिन राम का मन अब कहीं और था। वह चाहता था कि मीरा अपने भीतर की ताकत और बुद्धि को समझे, पर मीरा यह सब समझ नहीं पाई।
आखिरकार, जब सब्र की सीमा टूट गई, दोनों ने अलग होने का निर्णय लिया। मीरा का दिल चकनाचूर हो गया। वह अकेली हो गई, लेकिन उसने राम के शब्दों पर ध्यान देना शुरू किया। उसने सोचा, "अगर मेरी सुंदरता ही मुझे बाँध रही है, तो मैं उसे त्याग दूंगी।" मीरा घर से चली गयी पिताजी ने और राम ने बहुत ढूँढा पर पर सब ख़त्म हो गया शहर में सबसे पूंछा सबने अलग अलग कहानियां बताई आखिर थक हारकर दोनों ने उसके आने का इन्तजार किया...
उधर, राम ने अपने जीवन में मीरा के बिना जीने की कोशिश की, पर वह उसे भूल नहीं पाया। 10 साल बीत गए वह शहर छोड़ चुका था क्योंकि जब उसने यह घटनाक्रम अपने मालिक व्यापारी को बताया तो उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। खैर अब जब उसने 10 वर्षों के बाद इस तरह की बी.एस. के नाम से प्रकाशित पुस्तकों को देखा और पढ़ा, तो उसे एहसास हुआ कि इसमें हर वह चरित्र-चित्रण, घटनाक्रम लिखा हुआ है जो उसके जीवन में घटित हुआ हर उस ज्ञान की बातें लिखी हुई थी जो मीरा को बड़े शौक से राम सुनाया करता था यह वही मीरा थी आखिर वह 10 साल बाद पहचान गया की यह कोई और नहीं मेरी ही मीरा है ! जिसे उसने कभी प्रेम किया था। वह उसे ढूंढने निकल पड़ा। उसने गाँव, शहर, आश्रम, और यहां तक कि विदेशों में भी उसकी तलाश की। पर वह कभी मीरा से मिल नहीं पाया।
राम पूरी तरह से टूट चुका था। जब वह थक-हार कर वापस घर लौटा, तो उसे एक पत्र मिला। यह पत्र मीरा का था, जिसमें लिखा था कि वह उसे मिलने के लिए आई थी, पर उसे नहीं पा सकी। उस पत्र में लिखा था की मैं जिंदा हूँ राम। तुम्हारी मीरा जिंदा है, राम !
पत्र को जब आगे पढ़ा तो, उसमे लिखा था कि मैंने शहर छोड़ने का निश्चय किया। उसने अपने पिता को एक पत्र लिखकर बता दिया था, जिसमें उसने कहा कि वह ज्ञान की खोज में जा रही है और कभी वापस नहीं आएगी। उसने खुद को अपनी सुंदरता से दूर कर लिया और अपनी सारी ऊर्जा ज्ञान की प्राप्ति में लगा दी थी।
वह कैसे पढ़ाई और शोध में डूब गई, और धीरे-धीरे उसका नाम एक विदुषी के रूप में फैलने लगा। वह 'बी.एस.' नाम से लेख और पुस्तकें प्रकाशित करने लगी। उसकी विद्वता की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। पर कोई नहीं जानता था कि यह बी.एस. वही मीरा थी, जो कभी अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती थी।
परन्तु पत्र में यह भी लिखा था कि यह पहला और आखिरी पत्र है राम वह अब अपनी अंतिम अवस्था में है और बहुत बीमार है। और शीघ्र ही दुनिया से विदा लेने वाली है, राम यह पढ़कर स्तब्ध रह गया वह एकदम से ठंडा पड़ गया
राम का दिल टूट गया। उसने जल्दबाज़ी में मीरा को ढूंढने की कोशिश की, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मीरा का कैंसर से निधन हो चुका था।
मीरा ने अपने आखिरी दिनों में भी खुद को दुनिया से दूर रखा था। वह एकांत में अपनी तपस्या और अध्ययन में लगी रही थी, और उसी अकेलेपन में उसने अपनी अंतिम सांस ली।
राम मीरा की इस दर्दनाक मौत से सुन्न हो गया। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह बेहोश हो गया, और उसकी ज़िन्दगी में एक अधूरापन और पछतावा हमेशा के लिए छा गया।
समाप्त।
दिनेश उपाध्याय
(लेखक)
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