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ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन और सुधार रणनीति पर आधारित विचारों का सार

भारत का ओलंपिक प्रदर्शन:

  • पेरिस ओलंपिक में भारत 71वें स्थान पर रहा, 1.4 बिलियन आबादी और 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के बावजूद।
  • टोक्यो ओलंपिक में भारत ने 7 पदक (1 स्वर्ण) जीते थे, जबकि पेरिस में यह घटकर 6 रह गया।
  • खेलों में सुधार के लिए केवल देशभक्ति और नारेबाजी पर्याप्त नहीं है; सटीक और व्यवस्थित प्रयासों की आवश्यकता है।

सुधार रणनीति:

  • सरकार द्वारा पदक विजेताओं को दिए जाने वाले नकद पुरस्कारों का इस्तेमाल जमीनी स्तर की खेल सुविधाएं विकसित करने में होना चाहिए।
  • बेहतर स्थानीय सुविधाएं और संसाधन एथलीटों के करियर को लंबा कर सकते हैं और नए प्रतिभाओं के उभरने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
  • खेलों का राजनीतिकरण, अवसरों की कमी और पुराने खेल संघों का भ्रष्टाचार खेल प्रतिभाओं के विकास में बाधा डालता है।

खेलों का संस्थागत ढांचा:

  • खेल संघों पर अक्सर राजनेताओं और उनके परिजनों का कब्जा होता है, जिससे नए खिलाड़ियों के लिए अवसर कम हो जाते हैं।
  • खराब प्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण भारतीय खेलों की संरचना कमजोर है।
  • उदाहरण: हॉकी, मुक्केबाजी, और तीरंदाजी जैसे खेलों में फेडरेशन के गलत फैसले और कोचिंग विवादों ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन को प्रभावित किया।


प्रमुख समस्याएं:

  • कुछ खेल संघों पर दशकों तक एक ही व्यक्ति का कब्जा रहा है, जिससे खेलों का विकास अवरुद्ध हुआ है।
  • ओलिंपिक खिलाड़ियों की प्रतिभा होते हुए भी उन्हें सही प्रशिक्षण और संसाधन नहीं मिल पाते हैं।
  • धन और संसाधनों का बेहतर वितरण और पारदर्शी व्यवस्था की आवश्यकता है ताकि खिलाड़ियों को उचित प्रशिक्षण मिले और वे बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

अन्य देशों का उदाहरण:

  • छोटे देशों जैसे नीदरलैंड और केन्या के खिलाड़ियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, जबकि भारत को अपनी खेल प्रतिभाओं के विकास पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • खेलों में प्रदर्शन सुधारने के लिए प्रतिभाओं की खोज और उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देना अनिवार्य है।

निष्कर्ष:

  • खेल संघों को जिम्मेदारी से चलाना और पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है।
  • ओलंपिक में भारत को पदक तालिका में बेहतर स्थान प्राप्त करने के लिए मजबूत संस्थागत आधार और ठोस सुधार की जरूरत है।

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