हमारा बुंदेलखंड भले ही देश में गरीब है,
सूखाग्रस्त है, कई मामलों में पिछड़ा क्षेत्र है पर उसका कारण ये हरगिज नही कि हम अज्ञानी है अनपढ़ है बल्कि हम भावुक प्रकृति प्रेमी है हम इंसानों के विकास से ज्यादा महत्व नाजुक-नाजुक पौधों ,पेड़ो को देते है।
हम गरीब जरूर है पर हमारे यहाँ अमीरों ( दिल्ली ) वाला जहरीला प्रदूषण नहीं है। इसलिये हमें फक्र है इस प्रकृति प्रेम से ।
हजारों करोड़ों रुपये की परियोजनाओं (NTPC ,International Airport) का लालच न दिखाकर हमने कभी भी हजारों लाखों पेडों की बलि नहीं चढाई है।
लेकिन अब पुनः वही समय आ गया है
जिसमें वहीं प्रकृति प्रेम दिखाना है क्योंकि आज लाखों पेड़ कट गए तो उसमें दुःख की बात ये नहीं है कि हमारी ऑक्सीजन कम हो जाएगी या शव जलाने की लकड़ी कम पढ़ जाएगी l
असल में भीषण दुःख तो ये है कि पेड़ रूपी जीवों की हत्या की जाएगी
जो 50-100 साल से जिंदा खड़े है वो अचानक बेकसूर मारे जाएंगे उन पर निर्भर संवेदनशील जानवर नहीं बचेंगे दोष क्या है उनका, शायद कुछ नहीं ।
उनके घर-आवास उजड़ जाएंगे कभी उनका सोचा है कि उन्हें भी मुआवजा मिलना चाहिए। आज तक नहीं सोचा तो अब क्या सोचेंगे ?
लगता है जीने का अधिकार केवल इंसानों का है, कारण क्या है? बस कुछ महंगे महंगे हीरे निकालने है दिखावे का विकास करना है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
इंसानों को हीरों ,ऑक्सीजन का स्वार्थपना लालच छोड़कर एक बुद्धिमान जीव होने के नाते दूसरे कमजोर मूक जीव पेड़ को बचाना चाहिए
क्योंकि इन इंसानों की वजह से प्रकृति नहीं है, बल्कि उस बेजुबान प्रकृति की उदारता की वजह से इंसान है।
#SaveBuxwahaforest
धन्यवाद
~ दिनेश उपाध्याय
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