आरक्षण (वोट बैंक) नीति
हमारे पूर्वजों अर्थात् बुद्धिमान विद्वानों, प्रशासकों ने पिछले कुछ दशको में ऐसे कई "संरक्षण" संबंधी कानून , व्यवस्थाएँ, योजनाएँ बनाईं है जो एक अच्छी बात भी है क्योंकि देश का ऐसा जीवित वर्ग है जो इस संरक्षण का हकदार भी है जिसमें दिव्यांगों, पिछड़े जाति -जनजाति समुदाय के लोगों से लेकर के जानवर और जलवायु जैसे जंगल ,जल, शुद्ध हवा और खनिज आदि शामिल किए गए है किन्तु वर्तमान में पिछले कुछ सालों से एक आरक्षण जैसी व्यवस्था जो अस्थाई ढाँचे के साथ हमारे राजनीतिज्ञों में प्रचलित सी हो गई है जिसमें कोई प्रशासनिक, सामाजिक तथा कुछ हद तक आर्थिक उत्थान के लिए दलित वर्ग को दी गई प्राथमिकता युक्त विशेष पॉवर है परंतु इसका दुरुपयोग हो रहा है इस पॉवर का फायदा केवल राजनेताओं को चुनावी रेलियों और वोट बैंक हासिल करने में ही हुआ है, क्योंकि पिछले 60 से 70 वर्ष से समाज के एक वर्ग ने जिसे आमतौर पर उच्च वर्ग माना जाता है , उसने अपने दलित भाइयों को अपने मस्तक पर बैठाकर समता दिलाने का प्रयास किया है चाहे वह स्वयं भूखा सोता हो , टूटे कच्चे घर में रहता हो , खेती के लिए जमीन भी न हो ।हाँ लेकिन उच्च वर्ग में आता है इसलिए योग्यता का भी यहाँ कोई काम नहीं है। मैं ये सब इसलिए नहीं कह रहा कि मुझे आरक्षण पसंद नहीं है मैं इसलिए कह रहा हूँ मुझे आपकी (दलित परिवारों) चिंता है ,आपके मताधिकार की चिंता है अब मैं दलित और आरक्षण प्राप्त लोगों को एक जरूरी जानकारी देता हूँ भारत, सिंगापुर और चीन दोनों देशों के लोगों ने शासन अपने हाथ में एक ही समय लिया लेकिन 1980 के दशक आते आते दोनों देशों में रिफॉर्म हुए भारत में जहां आरक्षण को एक मूल अधिकार बनाकर दलितों को उनके हाल पर छोड़ दिया और समानता दिलाने का ढोंग रचा ! वहीं चीन में इसी समय एक-एक गरीब व पिछडे वर्ग के हरेक व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानकर उन्हें उनके ही हाल पर न छोड़कर उन्हें कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जिससे वे स्वरोजगार प्राप्त कर सके साथ ही रोजगार अन्यों को दें सके इसका लाभ भी वहाँ हुआ *विश्व बैंक के अनुसार, 85 करोड़ से अधिक चीनी लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाला गया है; चीन की गरीबी दर 1981 में 88 प्रतिशत से घटकर 2015 में 0.7 प्रतिशत हो गई, मैंने यह तुलना इसलिए की क्योंकि ये राजनेता ज्यादा जनसंख्या को गरीबी न हटने का मुद्दा मानते है ज्ञातव्य है कि 1970 -80 के बीच भारत की जनसंख्या लगभग 66 करोड़ और चीन की यहाँ से अधिक लगभग 92 करोड़ थी ,मैं यह नहीं चाहता की चीन का तानाशाही शासन भारत में हो बल्कि मैं चाहता हूँ कि सिंगापुर, जापान जैसे देशों की सतत् विकास की गतिविधियाँ अपनाई जाए ।
अतः गरीब व निम्न वर्ग को समझना होगा कि हमें पूर्णतः बेवकूफ बनाने और भटकाने का कार्य किया है इस देश और राज्यों में शासन के पद पर बैठे मुखियाओं ने आपके दिमाग में आ रहा होगा कि आरक्षण व गरीबी तो अलग-अलग मुद्दे है, परंतु नहीं क्योंकि आरक्षण का प्रथम उद्देश्य ही पिछड़े वर्ग की गरीबी दूर करना व उन्हें सशक्त बनाना ही है। अजीब लगता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न मुख्यमंत्रियों के द्वारा ये प्रतियोगिता सी शुरू हो गई है कि कौन ऐसी निहायती बेबुनियाद, अनुपयुक्त और प्रतिकूल प्रभावी नीतियाँ बनाने में अग्रणी रहता है । प्रश्न यह उठता है कि इनकी वोट बैंक नीतियाँ दूसरों का हक छीनने वाली ही क्यों होती है? इसमें आप कर्जमाफी को ही ले लीजिए इसमें मध्यम वर्ग के द्वारा दिया गया हजारों करोड़ों का टैक्स इन नेताओं ने किसानों को खैरात स्वरूप बांट दिया जिससे उनका कुल कर्ज का केवल 10 से 15% ही चुकता है ये क्या बात हुई ? किसानों के समझने लायक है! क्योंकि इसमें नेताओं का वोट बैंक सध गया और कुछ नही हुआ साथ ही साथ मेहनती किसान को कर्जमाफी की लत लगाकर उन्हें अधर में छोड़ दिया। दूसरी बात है आरक्षण में जिस प्रकार की दूसरों का हक छीनने वाली बकवास नीतियों -नियमों का बोलबाला है उसमें जो उच्च वर्ग है यदि वह उस संबंधित पद की किसी और से ज्यादा योग्यता और काबिलियत रखता है तो क्यों ? उसका हक छीनकर आप दलितो का उद्धार करना चाहते है जो दिखाता है कि आपके पास स्पष्ट नीतियों का अभाव है अब समय बदल रहा है समझ लीजिये कि ये आरक्षण जैसी निम्न वर्ग के उत्थान की अंतिम व एकमात्र नीति भी नहीं है इसके अलावा असंख्य नीतियां भी हो सकती है। सबकुुुछ पारदर्शी रूप में आप सब के और हमारे सामने है, इंटरनेट और सत्यापित आकड़े है इसलिए अपने दिमाग पर जोर डालिए और उठाइए अपनी कलम बना दीजिए कुछ ऐसी लोक कल्याणकारी नीतियाँ जो किसी का भी हक और अधिकार न छीनती हो, स्पष्ट हो, अनुकूल, सशक्त व प्रभावी हो जो देश का सतत् व सर्वोदय रूप में विकास कर सके, जैसा मोहनदास करमचंद गांधी जी का जो सपना था ताकि देश बदल सकें क्योंकि हमारे लोग मायने रखते हैं और हमारा राष्ट्र मायने रखता है जय भारत ॥

~Dinesh Upadhyay
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